कहते हैं, पहाड़ की बेटियां शादी के बाद चाहे कितनी भी दूर चली जाएं, उनका मन अपने मायके की पगडंडियों, आंगन और बचपन की यादों में कहीं न कहीं बसा रहता है। मां नंदा की कहानी भी कुछ ऐसी ही भावनाओं से जुड़ी मानी जाती है।
महलों में पली-बढ़ी एक राजकुमारी, जो हर सुख-सुविधा के बीच बड़ी हुई थी, विवाह के बाद कैलाश पहुंचती है—जहां उनके पति हैं हमारे भोले बाबा, औघड़ शिव। एक ऐसा संसार जहां राजसी वैभव का कोई मोह नहीं; भस्म से सजा शरीर, नागों की माला और रुद्राक्ष ही जिनका श्रृंगार हैं। ऐसे में मां नंदा को अपने मायके की याद आना और अपने लोगों से उनका मोह होना शायद स्वाभाविक ही था।
मायके आई हुई मां नंदा को अब फिर अपने ससुराल कैलाश लौटना है। लेकिन किन्हीं कारणों से लगभग 12 वर्षों बाद जब उनकी विदाई का समय आता है, तो यह विदाई सिर्फ एक बेटी की विदाई नहीं रहती। पूरा पहाड़ अपनी बेटी को ससुराल छोड़ने के लिए उसके साथ चल पड़ता है।
यही यात्रा आज नंदा देवी राजजात के नाम से जानी जाती है।
लेकिन इस यात्रा की कहानी सिर्फ मां नंदा तक सीमित नहीं है। इसके साथ कई ऐसे पात्र जुड़े हैं, जिनके बिना यह यात्रा अधूरी है—नौटी के नोतियाल, कांसुवा के कुंवर, मां नंदा और शिव, चौसिंघ्या खाड़ू, छंतोली बनाने वाले कांसुवा गांव के लोग, नौटी और कांसुवा के राजपुरोहित और पासवा, जिनके भीतर मां के अवतरण की मान्यता है।
इनके अलावा भी इस यात्रा से जुड़े कई महत्वपूर्ण पात्र और परंपराएं हैं, जिनसे हम आगे इस यात्रा के साथ-साथ मिलेंगे।
क्योंकि नंदा राजजात सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि एक बेटी को उसके मायके से कैलाश तक विदा करने की सदियों पुरानी कहानी है।
मां नंदा कौन हैं? मायका, ससुराल और कैलाश की कहानी
लोकमान्यता में मां नंदा को हिमालय की बेटी और राजमहलों में पली-बढ़ी राजकुमारी के रूप में देखा जाता है। उनका मायका वैभव, सुख-सुविधाओं और अपने लोगों के स्नेह से भरा हुआ माना जाता है। लेकिन विवाह के बाद उनका घर बना कैलाश, और उनके पति हैं हमारे भोले बाबा—भगवान शिव।
शिव का संसार राजसी वैभव से बिल्कुल अलग है। भस्म से सजा शरीर, गले में नागों की माला, रुद्राक्ष का श्रृंगार और मोह-माया से दूर एक औघड़ जीवन। ऐसे में मां नंदा का अपने मायके और वहां बिताए सुखद दिनों को याद करना, उनसे लगाव बनाए रखना—इस पूरी लोकपरंपरा का एक बेहद भावुक हिस्सा है।
इसीलिए जब मायके आई मां नंदा को फिर अपने ससुराल कैलाश लौटना होता है, तो पहाड़ इसे सिर्फ एक देवी की यात्रा नहीं मानता। यह अपनी बेटी को उसके ससुराल तक छोड़ने की विदाई बन जाती है।
और कैलाश में उनका इंतजार कौन कर रहा है? स्वयं भोले बाबा।
यही भाव आगे चलकर नंदा देवी राजजात की पूरी परंपरा को समझने की कुंजी बनता है—जहां मां नंदा की विदाई में पूरा पहाड़ उनके मायके वालों की तरह साथ चलता है।
नंदा देवी राजजात की शुरुआत कैसे और क्यों हुई?
अब तक हमने समझा कि मां नंदा के लिए मायके से ससुराल की ओर होने वाली यह विदाई इस पूरी यात्रा की मूल भावना है। लेकिन फिर सवाल उठता है—आखिर यह परंपरा शुरू कैसे हुई और इसे “राजजात” क्यों कहा गया?
नंदा देवी से जुड़ी यह परंपरा उत्तराखंड के गांवों, राजपरिवारों और स्थानीय लोकमान्यताओं के साथ सदियों से चली आ रही है। समय के साथ मां नंदा की विदाई एक बड़े सामूहिक आयोजन का रूप लेती गई, जिसमें अलग-अलग गांवों के लोग, देव डोलियां और छंतोलियां शामिल होने लगीं।
इस परंपरा में नौटी और कांसुवा का विशेष स्थान है। नौटी को पारंपरिक राजजात का प्रमुख आरंभिक स्थल माना जाता है, जबकि कांसुवा का संबंध राजपरिवार और यात्रा की पारंपरिक व्यवस्थाओं से जुड़ा रहा है।
यही वजह है कि इसे केवल किसी एक गांव की धार्मिक यात्रा नहीं कहा जा सकता। यह धीरे-धीरे ऐसी परंपरा बनी, जिसमें राजपरिवार की विरासत, राजपुरोहितों की भूमिका, स्थानीय देव परंपराएं और आम पहाड़ी समाज की आस्था एक साथ जुड़ती चली गईं।
और शायद इसी में “राजजात” शब्द का भाव भी छिपा है— एक ऐसी यात्रा, जिसमें राजा की परंपरा से लेकर गांव के सामान्य व्यक्ति तक, सभी मां नंदा को अपनी बेटी मानकर उनकी विदाई में शामिल होते हैं।
12 साल में एक बार ही क्यों निकलती है नंदा देवी राजजात?
नंदा देवी राजजात की सबसे खास पहचान ही इसकी लंबी अवधि और 12 वर्ष वाली परंपरा है। लेकिन यह केवल एक तय कैलेंडर अंतराल नहीं है; इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं, शुभ मुहूर्त और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं जुड़ी हुई हैं।
लोकमान्यता में मां नंदा को मायके आई बेटी माना जाता है। इसलिए उनकी यह यात्रा भी रोजमर्रा की किसी धार्मिक यात्रा की तरह नहीं, बल्कि एक विशेष विदाई के रूप में देखी जाती है। जैसे पहाड़ में बेटी वर्षों बाद मायके आती है और फिर एक विशेष अवसर पर उसे ससुराल विदा किया जाता है, उसी भाव को राजजात की परंपरा में देखा जाता है।
इसीलिए जब राजजात का समय आता है, तो केवल एक गांव इसकी तैयारी नहीं करता। महीनों पहले से गांवों में तैयारियां शुरू होती हैं, डोलियों और छंतोलियों की व्यवस्था होती है और अलग-अलग क्षेत्रों से लोग मां नंदा की विदाई में शामिल होने की तैयारी करते हैं।
यात्रा की तिथि भी मनमाने ढंग से तय नहीं होती। पंचांग, शुभ मुहूर्त और धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखकर इसके आयोजन का समय निर्धारित किया जाता है।
और इसी पूरी परंपरा के बीच एक और खास पात्र सामने आता है—चौसिंघ्या खाड़ू।
मान्यता है कि राजजात के लिए विशेष चौसिंघ्या खाड़ू का जन्म होना यात्रा के शुभ होने का संकेत माना जाता है और वही आगे चलकर मां नंदा की यात्रा का अगुआ बनता है।
इसलिए 12 साल का इंतजार सिर्फ समय बीतने का इंतजार नहीं है। यह उस क्षण की तैयारी है जब पूरा पहाड़ फिर से अपनी बेटी को कैलाश के लिए विदा करने एक साथ निकलता है।
नंदा देवी राजजात का पथप्रदर्शक — चौसिंघ्या खाड़ू
नंदा देवी राजजात में अगर मां नंदा को पहाड़ की बेटी माना जाता है, तो चौसिंघ्या खाड़ू को उनकी इस विदाई यात्रा का सबसे खास साथी और अगुआ माना जाता है। चार सींगों वाला यह विशेष मेढ़ा सामान्य पशु नहीं माना जाता, बल्कि पूरी यात्रा में इसका अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
लोकमान्यता है कि राजजात के लिए चौसिंघ्या खाड़ू का जन्म होना अपने आप में एक विशेष संकेत माना जाता है। इसे मां नंदा की यात्रा के लिए तैयार किया जाता है और यात्रा शुरू होने पर यह सबसे आगे चलता है। कठिन पहाड़ी रास्तों, जंगलों और ऊंचे हिमालयी भूभाग से गुजरती यात्रा में खाड़ू की मौजूदगी पूरी यात्रा को एक अलग ही पहचान देती है।
इसके जन्म को लेकर भी पहाड़ में कई मान्यताएं और कथाएं सुनने को मिलती हैं। एक लोककथा में इसे राजा के अपने वचन को पूरा करने से जुड़ा रूप भी माना जाता है—मान्यता है कि राजा स्वयं इस रूप में यात्रा की अगुवाई करने आते हैं। इसे हम इतिहास के निश्चित तथ्य की तरह नहीं, बल्कि स्थानीय लोकविश्वास के रूप में ही समझते हैं।
यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड तक पहुंचने के बाद चौसिंघ्या खाड़ू से जुड़ी परंपरा इस यात्रा को एक भावुक विराम देती है। यहीं से मां नंदा की विदाई की यह कहानी अपने सबसे कठिन और आध्यात्मिक पड़ाव में प्रवेश करती है।
शायद यही वजह है कि राजजात में चौसिंघ्या खाड़ू को सिर्फ यात्रा का हिस्सा नहीं, बल्कि मां नंदा की विदाई का एक जीवंत प्रतीक माना जाता है।
छंतोली — मां नंदा के साथ चलने वाली आस्था की छतरी
मां नंदा की राजजात में सिर्फ डोली और चौसिंघ्या खाड़ू ही नहीं चलते। इस यात्रा के साथ छंतोलियां भी निकलती हैं, जो दूर से ही अपनी रंग-बिरंगी सजावट और पारंपरिक स्वरूप के कारण पहचान में आ जाती हैं।
छंतोली को सामान्य छतरी समझना इसके महत्व को छोटा कर देना होगा। यह अलग-अलग परंपराओं और पक्षों की आस्था और सहभागिता का प्रतीक है। राजजात में इनके साथ जुड़ी अपनी-अपनी मान्यताएं और पहचान हैं।
परंपरा के अनुसार कांसुवा गांव के लोग छंतोली तैयार करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं। इन छंतोलियों की बनावट और सजावट में भी एक खास अंतर देखने को मिलता है। एक प्रकार की छंतोली में भोजपत्र की अस्तर लगाई जाती है, जिसे ससुराल पक्ष से जोड़ा जाता है, जबकि दूसरी छंतोली चमकीले रेशमी कपड़े से सजाई जाती है, जिसे मायके पक्ष का प्रतीक माना जाता है।
यानी मां नंदा की इस यात्रा में छंतोली भी वही कहानी कहती हुई चलती है, जो पूरी राजजात का मूल भाव है— एक बेटी अपने मायके से ससुराल की ओर जा रही है।
इन छंतोलियों को तैयार करने वाले लोगों की मेहनत भी अपने आप में इस यात्रा की लोकपरंपरा का हिस्सा है। महीनों पहले से तैयारी, कपड़ों और सजावट का चयन और फिर उन्हें यात्रा के लिए तैयार करना—यह सब केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी और आस्था है।
पासवा — जिनमें मां नंदा के अवतरण की मान्यता…
नंदा देवी राजजात की परंपरा में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिनकी भूमिका बाहर से देखने पर शायद तुरंत समझ नहीं आती। इन्हीं में से एक हैं पासवा।
लोकमान्यता के अनुसार, राजजात के दौरान पासवा के भीतर मां नंदा का अवतरण होता है। यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर जब यह धार्मिक मान्यता प्रकट होती है, तो इसे केवल एक व्यक्ति से जुड़ी घटना नहीं, बल्कि मां नंदा की उपस्थिति और आशीर्वाद के रूप में देखा जाता है।
पासवा की भूमिका यात्रा की आस्था और परंपरा से गहराई से जुड़ी है। इनके माध्यम से भक्तों को यह अनुभव होता है कि मां नंदा केवल डोली या छंतोली के रूप में यात्रा नहीं कर रहीं, बल्कि अपने भक्तों के बीच स्वयं उपस्थित हैं।
यही वजह है कि राजजात में पासवा को लेकर स्थानीय लोगों के बीच विशेष श्रद्धा रहती है। उनके साथ जुड़ी परंपराएं भी पीढ़ियों से चली आ रही हैं और हर बार की यात्रा में इनकी भूमिका अपने आप में एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है।
राजजात को समझने के लिए यह बात भी जरूरी है कि यहां हर पात्र केवल एक व्यक्ति नहीं है—वह एक परंपरा का वाहक है। चौसिंघ्या खाड़ू से लेकर छंतोली, पासवा और आगे आने वाले अन्य पात्र—सभी मिलकर मां नंदा की इस विदाई को पूरा करते हैं।
राजपुरोहित — जो परंपरा और शुभ मुहूर्त की कड़ी संभालते हैं
नंदा देवी राजजात की इतनी बड़ी और पुरानी परंपरा अपने आप नहीं चलती। इसके पीछे कई ऐसी जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें पीढ़ियों से कुछ परिवार और परंपरागत लोग निभाते आ रहे हैं। इनमें नौटी और कांसुवा के राजपुरोहितों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजजात से जुड़ी धार्मिक प्रक्रियाओं और शुभ समय के निर्धारण में राजपुरोहितों की परंपरागत भूमिका रहती है। वसंत पंचमी के अवसर पर पंचांग और धार्मिक विधियों के आधार पर यात्रा के समय और कार्यक्रम की घोषणा से जुड़ी परंपरा भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है।
यह सिर्फ तारीख तय करने की बात नहीं है। राजजात के अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान, परंपराएं और उनसे जुड़े नियम अपनी निश्चित मान्यताओं के अनुसार आगे बढ़ते हैं। इसलिए राजपुरोहित इस पूरी व्यवस्था में परंपरा, धार्मिक विधि और समय-निर्धारण के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी की तरह दिखाई देते हैं।
यही वह बिंदु है जहां हमें समझ आता है कि राजजात केवल हजारों लोगों के पैदल चलने वाली यात्रा नहीं है। इसके पीछे राजपरिवार, राजपुरोहित, गांवों के लोग, देव-परंपराएं और सदियों से चली आ रही मान्यताओं की एक पूरी व्यवस्था काम करती है।
और जब वसंत पंचमी पर यात्रा की घोषणा होती है, तो समझिए— मां नंदा की अगली विदाई की तैयारी अब शुरू हो चुकी है।
राजपरिवार और मां नंदा की राजजात
नंदा देवी राजजात की कहानी में राजपरिवार का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना नौटी, कांसुवा और इस यात्रा से जुड़े अन्य परंपरागत पक्षों का। यह यात्रा केवल किसी धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि गढ़वाल की राजपरंपरा और मां नंदा के साथ राजपरिवार के पुराने संबंध से भी जुड़ी हुई मानी जाती है।
लोकपरंपरा में चांदपुरगढ़ के राजा अजयपाल का नाम इस कहानी से विशेष रूप से जुड़ता है। मान्यता है कि राजा अजयपाल ने गढ़वाल में अलग-अलग गढ़ों और रियासतों को एक साथ लाने के बाद मां नंदा की इस परंपरा को राजाश्रय दिया। इसी राजपरंपरा के कारण आगे चलकर यह यात्रा राजजात के रूप में पहचानी गई।
कांसुवा के कुंवर भी इस परंपरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परंपरा के अनुसार, कांसुवा के कुंवर को राजपरिवार की ओर से मां नंदा की यात्रा से जुड़े दायित्वों का निर्वहन करना होता है। यात्रा की तैयारियों और उससे जुड़ी कई पारंपरिक प्रक्रियाओं में उनकी भूमिका आज भी इस विरासत की याद दिलाती है।
लेकिन समय के साथ राजसत्ता भले बदल गई हो, मां नंदा के प्रति यह रिश्ता खत्म नहीं हुआ। आज इस यात्रा में राजा की सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह भाव, जिसमें राजपरिवार भी बाकी पहाड़ की तरह मां नंदा को अपनी बेटी मानकर उनकी विदाई में शामिल होता है।
यही वजह है कि राजजात में राजपरंपरा और लोकआस्था एक साथ दिखाई देती हैं—एक तरफ राजपरिवार से जुड़ी सदियों पुरानी परंपराएं हैं, तो दूसरी तरफ हजारों सामान्य पहाड़ी लोग हैं, जो अपनी बेटी की विदाई समझकर मां नंदा के साथ कदम बढ़ाते हैं।
नौटी से कांसुवा — जहां से मां नंदा की राजयात्रा आगे बढ़ती है
राजपरिवार और राजपरंपरा की बात समझने के बाद अब समय है उस जगह लौटने का, जहां से राजजात की यात्रा वास्तव में आगे बढ़ती है—नौटी।
नौटी को नंदा देवी राजजात का प्रमुख आरंभिक स्थल माना जाता है। यहां से मां नंदा की डोली और यात्रा से जुड़े पारंपरिक पात्रों के साथ यह लंबी पदयात्रा शुरू होती है। लेकिन राजजात की शुरुआत को केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने के रूप में समझना ठीक नहीं होगा। नौटी से निकलते ही मां नंदा की विदाई का वह भाव जमीन पर दिखाई देने लगता है, जिसे हम अब तक कहानी के रूप में समझ रहे थे।
नौटी से यात्रा आगे बढ़ते हुए कांसुवा पहुंचती है। कांसुवा इस यात्रा का दूसरा बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव है और इसका संबंध राजपरिवार की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। यहीं से यात्रा में शामिल होने वाली कई पारंपरिक व्यवस्थाएं और पात्र अपनी भूमिका निभाते हैं।
कांसुवा के साथ कुंवरों की परंपरा जुड़ी है और यहीं तैयार होने वाली राजछंतोली भी इस यात्रा की एक महत्वपूर्ण पहचान है। रिंगाल से तैयार की गई यह छंतोली केवल यात्रा की शोभा नहीं बढ़ाती, बल्कि मां नंदा के मायके और ससुराल से जुड़ी उस भावनात्मक परंपरा को भी अपने साथ लेकर चलती है, जिसे हमने ऊपर समझा।
इस तरह नौटी और कांसुवा, दोनों मिलकर राजजात के शुरुआती चरण को पूरा करते हैं—एक तरफ नौटी से यात्रा का धार्मिक और पारंपरिक आरंभ, और दूसरी तरफ कांसुवा से जुड़ी राजपरंपरा और छंतोली की भूमिका।
अब यहां से यात्रा धीरे-धीरे गांवों और बस्तियों को पीछे छोड़कर ऊंचे हिमालय की ओर बढ़ने लगेगी। रास्ता बदलेगा, भूगोल बदलेगा, मौसम बदलेगा—और हर अगले पड़ाव के साथ मां नंदा की यह विदाई यात्रा अपने अंतिम लक्ष्य, होमकुंड, के और करीब पहुंचती जाएगी।
नौटी से होमकुंड तक — मां नंदा के साथ हिमालय की ओर…
नौटी और कांसुवा से शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे पहाड़ की ऊंचाइयों की ओर बढ़ती जाती है। शुरुआत में रास्ता गांवों, खेतों और स्थानीय बस्तियों के बीच से गुजरता है, लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, हिमालय का भूगोल और मौसम दोनों बदलने लगते हैं।
राजजात का पारंपरिक मार्ग लगभग 280 किलोमीटर लंबा माना जाता है। इस पूरे रास्ते में कई ऐसे पड़ाव आते हैं, जिनका अपना भौगोलिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। कोई पड़ाव गांवों के बीच है, तो कोई घने जंगलों और ऊंचे बुग्यालों के बीच; कहीं रास्ता आसान दिखाई देता है, तो आगे वही यात्रा कठिन चढ़ाइयों में बदल जाती है।
हर पड़ाव सिर्फ रास्ते में आने वाली एक जगह नहीं है। कहीं मां नंदा की पूजा होती है, कहीं स्थानीय लोग यात्रियों का स्वागत करते हैं, कहीं कठिन चढ़ाई शुरू होती है और कहीं हिमालय का स्वरूप बिल्कुल बदल जाता है।
इसीलिए राजजात को केवल एक धार्मिक पदयात्रा कहना शायद अधूरा होगा। यह एक ऐसा रास्ता है जहां लोकविश्वास, पहाड़ी जीवन और हिमालय का भूगोल एक साथ चलते हैं।
अब आइए, इस पूरे मार्ग को पड़ाव-दर-पड़ाव समझते हैं—नौटी से शुरू करके उस अंतिम ऊंचाई तक, जहां मां नंदा की विदाई होमकुंड के शांत हिमालयी विस्तार में पहुंचती है।
राजजात के प्रमुख पड़ाव — हर पड़ाव की अपनी कहानी
नौटी से निकलने के बाद राजजात का रास्ता सिर्फ किलोमीटरों में नहीं मापा जाता। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, गांवों से जंगल, जंगलों से बुग्याल और फिर ऊंचे हिमालयी भूभाग तक पूरा वातावरण बदलता जाता है। पारंपरिक मार्ग में कई पड़ाव आते हैं और हर पड़ाव का अपना धार्मिक, सांस्कृतिक या भौगोलिक महत्व है।
1. कांसुवा
नौटी के बाद कांसुवा राजजात का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसका संबंध कुंवरों की परंपरा और राजछंतोली से जुड़ा है। यहीं से यात्रा का शुरुआती धार्मिक और राजपरंपरागत स्वरूप और स्पष्ट दिखाई देता है।
2. सेम
सेम की ओर बढ़ते हुए यात्रा गांवों और पहाड़ी रास्तों से गुजरती है। यहां स्थानीय आस्था और यात्रियों के स्वागत की परंपरा यात्रा को आगे बढ़ाती है।
3. कोटी
कोटी यात्रा के शुरुआती हिस्से का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां तक यात्रा अभी भी बसे हुए पहाड़ी क्षेत्र के बीच चलती है और रास्ते में गांवों तथा सीढ़ीनुमा खेतों का दृश्य दिखाई देता है।
4. भगोती
भगोती से जुड़ी लोकपरंपरा में मां नंदा का अपनी बहन से मिलने की मान्यता भी मिलती है। इसलिए यह पड़ाव सिर्फ विश्राम स्थल नहीं, बल्कि यात्रा की लोककथाओं में भी अपनी जगह रखता है।
5. कुलसारी
कुलसारी राजजात के महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ावों में गिना जाता है। यहां पहुंचते-पहुंचते यात्रा का वातावरण और अधिक पहाड़ी और वन क्षेत्र वाला होने लगता है।
6. नंदकेशरी
नंदकेशरी वह स्थान है जहां राजजात के साथ अन्य देव डोलियों और छंतोलियों के जुड़ने का महत्व सामने आता है। यहां यात्रा का स्वरूप और बड़ा होता जाता है।
7. वाण
वाण के बाद राजजात धीरे-धीरे उस ऊंचाई की ओर बढ़ती है जहां सामान्य पहाड़ी गांव पीछे छूटने लगते हैं। इसके आगे का रास्ता हिमालयी जंगलों और ऊंचाई वाले क्षेत्र की ओर जाता है।
8. गैरोली पातल
गैरोली पातल के बाद यात्रा का भूगोल तेजी से बदलता है। जंगलों से निकलकर रास्ता ऊंचे खुले भूभाग और बुग्यालों की ओर बढ़ता है।
9. बेदनी बुग्याल
यात्रा का सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण प्राकृतिक पड़ावों में से एक—बेदनी बुग्याल। यहां खुला alpine meadow, दूर दिखाई देती हिमालयी चोटियां और विशाल आसमान यात्रा को बिल्कुल अलग अनुभव देते हैं।
10. पातर नचौणियां
बेदनी के बाद पातर नचौणियां आता है। यहां से ऊंचाई और कठिनाई दोनों बढ़ने लगती हैं। स्थानीय लोककथाओं में इस जगह का संबंध नृत्य करती महिलाओं के पत्थर बन जाने की कथा से जोड़ा जाता है।
11. कालू/कैलुआ विनायक
यह ऊंचाई पर स्थित गणेश से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। यहां से यात्रा का रास्ता और अधिक कठिन और पथरीला होता जाता है। आगे बढ़ने से पहले यह पड़ाव धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
12. रूपकुंड
ऊंचे हिमालय में स्थित रहस्यमय रूपकुंड इस मार्ग का सबसे चर्चित स्थानों में से एक है। झील के आसपास मिले मानव कंकालों के कारण इसे दुनिया भर में Skeleton Lake के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि राजजात की कहानी में इसका महत्व केवल रहस्य तक सीमित नहीं है—यह यात्रा के सबसे ऊंचे और कठिन भूभागों में आने वाला पड़ाव है।
13. शिला समुद्र
रूपकुंड क्षेत्र को पार करने के बाद रास्ता और अधिक पथरीला, निर्जन और हिमालयी हो जाता है। शिला समुद्र नाम ही इस भूगोल की तस्वीर सामने रख देता है—चट्टानों से भरा ऊंचा इलाका, जहां वनस्पति बहुत कम दिखाई देती है।
14. होमकुंड
और आखिर में आती है वह जगह, जहां इस लंबी यात्रा का सबसे भावुक पड़ाव सामने आता है—होमकुंड।
यहां तक पहुंचना केवल यात्रा पूरी करना नहीं है। मां नंदा को उनके ससुराल कैलाश की ओर विदा करने की परंपरा का यह अंतिम और सबसे ऊंचा पड़ाव है। यहीं राजजात की धार्मिक यात्रा अपने चरम पर पहुंचती है।
यही कारण है कि नौटी से होमकुंड तक का रास्ता सिर्फ एक route नहीं है। यह धीरे-धीरे बदलते हिमालय के साथ चलती हुई एक ऐसी कहानी है, जिसमें हर पड़ाव मां नंदा की विदाई का एक नया अध्याय खोलता है।
2014 की राजजात — 12 साल बाद निकली ऐतिहासिक यात्रा…
नंदा देवी राजजात की परंपरा के अनुसार यह यात्रा 12 वर्ष के अंतराल पर निकलती है। लेकिन 2013 में जिस राजजात को निकलना था, वह उस साल उत्तराखंड में आई विनाशकारी आपदा के बाद मार्ग की स्थिति खराब होने के कारण स्थगित कर दी गई। यात्रा के कई रास्ते और पड़ाव बुरी तरह प्रभावित हुए थे, इसलिए श्रद्धालुओं की सुरक्षा को देखते हुए इसे आगे बढ़ाना संभव नहीं था।
इसके बाद 2014 में मां नंदा की राजजात फिर से निकली। 18 अगस्त 2014 से शुरू हुई यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर की थी और 6 सितंबर तक चली। नौटी से शुरू होकर यह यात्रा ऊंचे हिमालयी भूभाग से गुजरते हुए होमकुंड तक पहुंची।
लेकिन 2014 की यात्रा सिर्फ इसलिए खास नहीं थी कि यह 12 साल बाद हुई थी। 2013 की आपदा के बाद पहली बार इतनी बड़ी धार्मिक यात्रा का उसी कठिन हिमालयी क्षेत्र में फिर से आगे बढ़ना, अपने आप में एक भावनात्मक और चुनौतीपूर्ण अवसर था।
यात्रा के शुभारंभ के समय लगभग 50,000 लोग नौटी में मौजूद थे। हजारों श्रद्धालुओं की भीड़, मां नंदा के जयकारे और चार सींग वाले खाड़ू के साथ शुरू हुई यह यात्रा पूरे उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
इसके बाद यात्रा धीरे-धीरे गांवों से निकलकर जंगलों, बुग्यालों और ऊंचे हिमालय की ओर बढ़ती गई। बेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां, रूपकुंड, शिला समुद्र और अंत में होमकुंड—हर पड़ाव के साथ यात्रा और कठिन होती गई, लेकिन श्रद्धा भी उतनी ही गहरी दिखाई दी।
2014 की राजजात को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं थी। यह एक आपदा के बाद फिर से उठ खड़े होने, अपनी परंपरा को बचाए रखने और मां नंदा को विदा करने के सामूहिक संकल्प की यात्रा भी थी।
और शायद यही वजह है कि 2014 की राजजात की तस्वीरें आज भी सिर्फ भीड़ या पहाड़ नहीं दिखातीं—वे उस समय के विश्वास, संघर्ष और पहाड़ की सामूहिक भावना को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
2026 की बड़ी नंदा जात और 2027 की राजजात — फर्क क्या है?
यहीं सबसे ज्यादा भ्रम पैदा हुआ है। 2026 और 2027 में मां नंदा की यात्रा होमकुंड तक जाएगी, लेकिन दोनों यात्राओं को एक ही राजजात समझना सही नहीं होगा। फर्क मुख्य रूप से इनके स्वरूप, नेतृत्व और परंपरागत आयोजन का है।
2026 में कुरुड़ से बड़ी नंदा जात निकल रही है। इसमें दशोली परगना और बंड परगना सहित अलग-अलग क्षेत्रों की मां नंदा की डोलियां शामिल होती हैं। यात्रा आगे बढ़ते हुए वाण तक पहुंचती है और वहां से आगे की यात्रा के लिए डोलियों का मिलन होता है। यानी 2026 की यह यात्रा अलग-अलग क्षेत्रीय नंदा परंपराओं को एक साथ लेकर होमकुंड की ओर जाने वाली बड़ी जात के रूप में सामने आती है।
वहीं 2027 में नौटी से पूर्ण नंदा देवी राजजात आयोजित होगी। इसकी अपनी पारंपरिक राजजात व्यवस्था है, जिसमें नौटी, कांसुवा, राजछंतोली और राजपरंपरा का विशेष स्थान है। वाण में हुई बैठक में भी संबंधित ग्रामीणों, कुरुड़ मंदिर समिति और पड़ाव समितियों की मौजूदगी में 2027 में राजजात आयोजित करने पर सहमति बनी।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:
2026 — बड़ी नंदा जात कुरुड़ और विभिन्न क्षेत्रीय डोलियां → वाण में मिलन → आगे हिमालय की ओर → होमकुंड
2027 — पूर्ण नंदा देवी राजजात नौटी → कांसुवा → राजछंतोली और राजपरंपरा → पारंपरिक राजजात मार्ग → होमकुंड
इसलिए होमकुंड दोनों यात्राओं का गंतव्य हो सकता है, लेकिन यात्रा की पहचान और परंपरागत स्वरूप अलग है। 2026 की बड़ी जात को 12 साल में होने वाली पूर्ण राजजात कहना ठीक नहीं होगा।
और शायद इस पूरे अंतर को समझने का सबसे अच्छा तरीका यही है—2026 में मां नंदा की क्षेत्रीय डोलियां एक बड़े सामूहिक भाव के साथ आगे बढ़ेंगी, जबकि 2027 में नौटी से जुड़ी राजपरंपरा के अनुसार पूर्ण राजजात का आयोजन होगा।
यानी अंतर मां नंदा के गंतव्य का नहीं, बल्कि यात्रा के स्वरूप और परंपरागत आयोजन का है।मार्ग और होमकुंड की ओर जाने वाली यात्रा के रूप में प्रस्तावित है।
राजजात की कठिन राह — ऊंचाई बढ़ने के साथ बदलता हिमालय
राजजात की यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, रास्ता भी अपना स्वरूप बदलता जाता है। शुरुआत में यात्रा गांवों, खेतों और बस्तियों के बीच से गुजरती है, लेकिन वाण के बाद हिमालय का कठिन और ऊंचाई वाला क्षेत्र सामने आने लगता है।
बेदनी बुग्याल तक पहुंचते-पहुंचते यात्रियों को खुले बुग्याल, तेज ठंडी हवाएं और ऊंचाई का असर महसूस होने लगता है। इसके बाद पातर नचौणियां, कालू विनायक और रूपकुंड की ओर बढ़ता रास्ता और चुनौतीपूर्ण होता जाता है।
यहां मौसम कभी भी बदल सकता है। कुछ ही देर में साफ आसमान बादलों से घिर सकता है और धूप के बीच अचानक ठंडी हवा चलने लगती है। रास्ते में लंबे समय तक सुविधाएं भी सीमित रहती हैं। इसलिए राजजात में श्रद्धा के साथ तैयारी और शारीरिक क्षमता भी उतनी ही जरूरी है।
और जब यात्रा रूपकुंड से आगे शिला समुद्र और होमकुंड की ओर बढ़ती है, तो आसपास का दृश्य और भी निर्जन और कठोर हो जाता है। पेड़-पौधे कम होते जाते हैं और चारों तरफ चट्टानों, बर्फीली हवाओं और ऊंचे पहाड़ों का संसार दिखाई देता है।
यही वह हिस्सा है जहां समझ आता है कि राजजात केवल धार्मिक आस्था की यात्रा नहीं, बल्कि हिमालय के कठिन भूगोल के बीच की जाने वाली एक बेहद चुनौतीपूर्ण पदयात्रा भी है।
राजजात में जाने से पहले — अपने साथ क्या-क्या रखें?
हालांकि राजजात के दौरान जगह-जगह भोजन और विश्राम की व्यवस्था स्थानीय लोगों और प्रशासन की ओर से की जाती है, लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हर सुविधा हर समय मिल पाना संभव नहीं होता। इसलिए अपनी जरूरत का जरूरी सामान साथ रखना बेहतर है।
🏕️ कैंपिंग का सामान — Tent, Sleeping Bag, Sleeping Mat, Torch/Headlamp और Waterproof Bag
🩹 दवाइयां व First Aid — अपनी जरूरी medicines, Bandage, Antiseptic और Basic First-Aid Kit
🥜 हल्का लेकिन Energy देने वाला Food — Dry Fruits, Roasted Chana, Peanuts, Energy Bars जैसे हल्के और protein/energy-rich snacks
🧥 गर्म कपड़े — Warm Jacket, Thermal, Woollen Cap, Gloves, Extra Socks और Rain/Wind Protection
💧 पानी व Personal Essentials — Reusable Water Bottle, Sunglasses, Sunscreen, Lip Balm और जरूरी personal items
💰 Extra Cash — ऊंचाई वाले इलाकों में ATM, UPI या Network हर जगह उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं; इसलिए कुछ नकद साथ रखें
एक बात याद रखें: स्थानीय लोगों का सहयोग राजजात की खूबसूरत परंपरा है, लेकिन अपनी व्यक्तिगत तैयारी और सुरक्षा की जिम्मेदारी अपनी ही होती है।
राजजात के दौरान स्थानीय लोगों का साथ — इस यात्रा की सबसे खूबसूरत परंपरा
हालांकि राजजात के दौरान जगह-जगह भोजन और विश्राम की व्यवस्था स्थानीय लोगों और प्रशासन की ओर से की जाती है, लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हर सुविधा हर समय मिल पाना संभव नहीं होता। इसलिए अपनी जरूरत का जरूरी सामान साथ रखना बेहतर है।
🏕️ कैंपिंग का सामान — Tent, Sleeping Bag, Sleeping Mat, Torch/Headlamp और Waterproof Bag
🩹 दवाइयां व First Aid — अपनी जरूरी medicines, Bandage, Antiseptic और Basic First-Aid Kit
🥜 हल्का लेकिन Energy देने वाला Food — Dry Fruits, Roasted Chana, Peanuts, Energy Bars जैसे हल्के और protein/energy-rich snacks
🧥 गर्म कपड़े — Warm Jacket, Thermal, Woollen Cap, Gloves, Extra Socks और Rain/Wind Protection
💧 पानी व Personal Essentials — Reusable Water Bottle, Sunglasses, Sunscreen, Lip Balm और जरूरी personal items
💰 Extra Cash — ऊंचाई वाले इलाकों में ATM, UPI या Network हर जगह उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं; इसलिए कुछ नकद साथ रखें
एक बात याद रखें: स्थानीय लोगों का सहयोग राजजात की खूबसूरत परंपरा है, लेकिन अपनी व्यक्तिगत तैयारी और सुरक्षा की जिम्मेदारी अपनी ही होती है।
अंत में — मां नंदा की विदाई और चौसिंघ्या खाड़ू का अकेला सफर
शायद नंदा देवी राजजात को समझने के लिए आखिर में हमें फिर उसी भाव पर लौटना होगा, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी—एक बेटी की विदाई।
मां नंदा को पहाड़ की बेटी माना जाता है। जब उनकी डोली मायके से कैलाश की ओर निकलती है, तो यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं रहती। गांव की महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे और हजारों श्रद्धालु उन्हें अपनी बेटी की तरह विदा करते हैं। रास्ते भर उनके साथ चलते हैं, उनकी सेवा करते हैं और फिर उस क्षण का इंतजार करते हैं जब उन्हें अपने मायके से ससुराल की ओर विदा होना होता है।
लेकिन इस पूरी विदाई में चौसिंघ्या खाड़ू की कहानी सबसे ज्यादा मन को छूती है।
परंपरा के अनुसार यही चार सींग वाला खाड़ू मां नंदा की यात्रा का अगुआ बनकर उनके साथ चलता है और आखिर में होमकुंड से आगे कैलाश की ओर अकेला चला जाता है। इंसानी नजर से देखें तो वह एक बेजुबान जानवर है—जिसे उन वीरान, ऊंचे और कठिन पहाड़ों में अकेला छोड़ दिया जाता है।
यहीं पर हमारी आस्था और भावना एक साथ सामने आती है।
हम मानते हैं कि मां नंदा जिस खाड़ू को अपने साथ लेकर जाती हैं, उसे भोलेनाथ की शरण मिलती है। शायद इसी विश्वास के कारण हजारों लोग उसके उस आखिरी सफर को सिर्फ एक जानवर का अकेले चले जाना नहीं, बल्कि मां नंदा के साथ उसके कैलाश तक पहुंचने की यात्रा मानते हैं।
फिर भी एक सवाल मन में रह जाता है—क्या हमारी परंपरा के साथ हमारी जिम्मेदारी भी नहीं होनी चाहिए? आस्था अपनी जगह है, लेकिन एक जीव के प्रति संवेदना भी उतनी ही जरूरी है। इसलिए इस परंपरा को समझते हुए हमें उसके हर पक्ष को सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ देखना चाहिए।
क्योंकि आखिर में राजजात हमें सिर्फ मां नंदा की विदाई नहीं सिखाती—यह हमें पहाड़ की संस्कृति, लोगों की आस्था, प्रकृति और उन बेजुबान जीवों के प्रति संवेदनशील होना भी सिखाती है, जो इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं।
🙏 स्रोत, सहयोग और विशेष धन्यवाद
इस लेख को तैयार करने के दौरान हमने उत्तराखंड की संस्कृति, परंपराओं और यात्राओं पर लगातार काम कर रहे कई लोगों और स्रोतों से जानकारी और संदर्भ लिए हैं।
खास तौर पर Neeraj Daa का उल्लेख करना चाहेंगे — Instagram: @iamneerajpant — जो उत्तराखंड की संस्कृति, परंपराओं और यात्राओं से जुड़े content के माध्यम से लोगों को हमारी पहाड़ी विरासत से जोड़ने का काम कर रहे हैं।
इसी तरह हमारी Swati Di भी Instagram: @kumaonirootsbyswati के माध्यम से उत्तराखंड की संस्कृति और जड़ों से जुड़े content को अपनी अलग पहचान के साथ सामने ला रही हैं।
इसके अलावा, इस लेख को तैयार करने में हमने पुरानी राजजातों से जुड़े उपलब्ध संदर्भों, YouTube पर उपलब्ध लोकगीतों और अन्य सामग्री, एक dedicated documentary तथा अलग-अलग स्थानों से प्राप्त जानकारियों का भी सहारा लिया है।
हमारा उद्देश्य किसी की सामग्री को अपना बताना नहीं, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारी को समझकर और जोड़कर मां नंदा की इस महत्वपूर्ण परंपरा को एक जगह दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत करना है।
फिर भी, लोकपरंपराओं और ऐतिहासिक यात्राओं से जुड़ी जानकारियों में अलग-अलग मान्यताएं और विवरण मिल सकते हैं। यदि इस लेख में आपको कोई तथ्य, नाम, स्थान, परंपरा या जानकारी गलत या अधूरी लगे, तो हमें जरूर बताएं।
हम उसे जांचेंगे और जरूरत पड़ने पर जरूर सुधारेंगे।
यह कहानी हमारी पहाड़ की संस्कृति की है—इसलिए इसे सही, सम्मानजनक और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना हमारी भी जिम्मेदारी है। यह सिर्फ हमारा लिखा हुआ travel blog नहीं है—यह हमारी पहाड़ की संस्कृति और मां नंदा से जुड़ी आस्था की कहानी है।
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